OPERATION BLUE STAR

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Operation blue star in golden tample amritsar

Operation blue star in hindi?

हमारे मुल्क का बटवारा

1947 में जब हम आजाद हुए अंग्रेजो से तो अंग्रेजो ने जाते जाते अपना काम करके जाते है हमारे मुल्क का बटवारा| एक पाकिस्तान बना और एक हिंदुस्तान इस बटवारे में बहुत ज्यादा नुकसान भी हुआ इस बटवारे के चलते दंगे भी हुए हज़ारो लोग मारे भी गए पाकिस्तान से बहुत लोग पलायन करके हिंदुस्तान आये और हिंदुस्तान से कुछ लोग पलायन करके पाकिस्तान गए हिन्दू ,मुस्लिम, सिख सभी का बहुत नुकसान हुआ| ये करवा सच है धर्म और मजहब के नाम से ही बटवारा हुआ था और जिसको जंहा पे सहूलियत लगी वे वहाँ गए.

लेकिन इन सारी चीजों के बिच में एक चीज़ जिसपे लोग कम ही चर्चा करते है वो ये है की इस बटवारे में पंजाब का बहुत ज्यादा नुकसान हुआ था. और तो और पंजाब के भी दो टुकड़े हो गए बदकिश्मती से एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के हिस्से में चला गया और उस वक़्त जो है लाहोर एक तरह से कहे तो बहुत बड़ा सेंटर था पंजाब प्रान्त का और वो लाहौर भी पाकिस्तान के पास चला गया. तो इससे खास तौर पर पंजाब के लोगो को लगा की उनके साथ ज्यादा जास्ती और नुकसान हुआ है फिर जो बटवारे में इधर से उधर लोग आये गए उसमे भी बहुत सारे जाने गई उसका भी असर पंजाब पर परा तो हिन्दू मुस्लिम के साथ साथ इससे शिखो को बहुत नुकसान हुआ इस बटवारे की वजह से और पाकिस्तान के जो सिख थे जिनकी लाहौर में हुकूमत चलती थी और तो और पंजाबीओ का लाहौर एक साम्राज्य था बल्कि एक तरह से राजधानी भी कह सकते है|

एक नया राज्य बना पंजाब

लाहौर जब पाकिस्तान में चला गया और धीरे धीरे दंगो की आग कम होने लगी तो यहाँ पे यह हुआ की अब सीखो के लिए अलग राष्ट्र की मांग की सुगबुगाहट धीरे धीरे शुरू हो गई बरे पैमाने पर नहीं पर थी जरूर और उसी वक़्त एक नाम परा था खालिस्तान लेकिन उस वक़्त ये चीज़े उतनी उठी नहीं| बात हो रही थी की सीखो के लिए एक अलग राज्य टाइप का हो जिसको राष्ट्र का भी नाम देने केलिए उस वक़्त कोसिस की गई थी इसके बिच में आंदोलन भी चला की सीखो का अलग राज्य होना चाहिए और ये मांग जोर पकड़ती गई इसी दौरान में आंध्रा में पहली बार एक मूवमेंट चला था तब आंध्रा भी अलग राज्य नहीं था मूवमेंट ये था की भाषा के आधार पर राज्य की मांग धरना प्रदर्शन और आंदोलन के बाद ये मान लिया गया और आंध्रा प्रदेश एक राज्य बना देश में ये पहला राज्य है जो भाषा के आधार पर बना तो इससे सबक लेते हुए यहाँ पे सीखो के लिए अलग राज्य की बजाये भाषा के आधार पर एक राज्य होना चाहिए 1 NOVEMBER 1966 को पंजाबी भाषा के आधार पर विभाजित कर दिया गया और एक नया राज्य बना पंजाब.

पंजाब इसलिए की यहाँ के लोग पंजाबी बोलते है पंजाब के साथ हरयाणा का भी कर दिया गया हरयाणा का नाम ह से इसलिए रखा गया की हरयाणा में हिंदी भासी ज्यादा है और उसके बाद चुनाव और सारी चीजे जो अपने राज्य का होता है वो चलता रहा लेकिन उसके बाद फिर धीरे धीरे चीजे बदलती गई भाषा के आधार पर राज्य तो बन गया लेकिन अब चंडीगढ़ को लेकर लड़ाई शुरू हो गई की चंडीगढ़ पंजाब को मिलना चाहिए लेकिन चंडीगढ़ हरयाणा की भी राजधानी.

चुकी पंजाब एक कृषि प्रधान राज्य है और वंहा खेती बहुत अच्छे से होती है फिर ये हुआ की पानी का नहर जिसपे उसका पूरा अधिकार है वो मांग भी उठे उसको भी लेके थोड़ी सी खटास आई ये सारी चीजे चलती रही और पंजाब में वक़्त वक़्त पर ये मांग उठता रहा इसी में यह है की जो पंजाब राज्य की बात है तो कोसिस यही थी की जितने भी पंजाबी भाषा बोलने वाले है वो सब एक जगह आये ये भी उस वक़्त के कुछ लोगो की सोच थी पर ऐसा कुछ हुआ नहीं हिंदुस्तान में आज भी अलग अलग जगहों पे तमाम शिख रहते है और शिख के बारे में यह भी है की यह धर्म एक नए धर्मो में से एक है क्युकी इस धर्म का इतिहास 1469–1539 में गुरुनानक देव ने इस धर्म की स्थापना की थी तो करीब 500 -600 साल के बिच पुराना ये धर्म है।

सिख और निरंकारी

सिख धर्म में 10 गुरु हुए और उसके बाद गुरु ग्रन्थ साहिब ही सीखो का गुरु का दर्जा रखेंगे ये गुरु गोविन्द सिंह ने कहा था| गुरु ग्रन्थ साहिब जी के बाद कोई दूसरा गुरु नहीं होगा उसी वक़्त गुरु अर्जन देव थे जो सीखो के पांचवे गुरु थे। तब उन्होंने अमृतसर में हरमंदिर साहिब की स्थापना किये थे और उसके बाद जब महराजा रणजीत सिंह आये तब उन्होंने हरमंदिर साहिब के ऊपर सोने की परत चढ़ाये थे और सोने के परत चढाने के बाद ही उस हरमंदिर साहिब को एक नया नाम मिला GOLDEN TAMPLE (स्वर्ण मंदिर) अब सीखो में दो चीजे  थी एक सिख और एक निरंकारी इन दोनों में एक थोड़ी सी मतभेद थी वो ये की सिख जो मानते है की दस गुरुओ के बाद जो गुरु ग्रन्थ जी है वही आखरी गुरु है और उसके बाद कोई गुरु आएगा नहीं लेकिन निरंकारी का ये मानना है की कोई भी जीवित इंसान गुरु बन सकता है आने वाले वक़्त में भी इसलिए ही निरंकारी के अलग अलग गुरु भी हुए तो इसको लेके दोनों में मतभेद था।

अब ये सारी चीजे चलती रही इसी बिच में एक आनंदपुर साहब में एक रेसूलुशन पास होता हैं जो आकालिओ ने पास किया था. और वो ये था की पंजाब को राज्य का दर्जा मिला लेकिन चंडीगढ़ नहीं| तो पंजाब को पानी का पूरा हिस्सा मिले और भी बहुत सारी मांग थी तो उसको लेकर समय समय पर विरोध धरना प्रद्रशन सबकुछ होता रहता था. और इसी बिच में तब कांग्रेस की सरकार थी वहाँ पे और फिर अकाली की भी सरकार थी लेकिन जब 1975 में EMERGENCY लगी तो पुरे देश में इंद्रा गाँधी की हार हुई थी।

और फिर 1977 में चुनाव हुए EMERGENCY के बाद तो इंद्रा गाँधी बुरी तरह हार गई और पंजाब में भी हार मिली पंजाब में अकाली की सरकार वापस आई जब वापस आई तो अकाली मजबूत होने लगे और अब ये था की CENTRAL में तो इंद्रा गाँधी जैसे ताकतवर नेता थी लेकिन पंजाब में ऐसा कोई नहीं था जो कांग्रेस को पंजाब में फिर से लाये और आनंदपुर साहिब का जो रेसूलुशन था उसका भी मांग बढ़ रहा था. दोनों चीज एकसाथ हो रही थी कांग्रेस भी चाहती थी की किसी को लाया जाये 1977 के बाद खैर फिर तीन साल के बाद जनता पार्टी की सरकार जाती है।

जरनैल सिंह भिंडरावाले

और 1980 में दोबारा चुनाव होता है और इंद्रा गाँधी बहुत मेजोरिटी के साथ दोबारा सत्ता में वापस आती हैं और साथ साथ पंजाब में भी कांग्रेस की सरकार बनती है 1977 से 1980 के बिच में जब कांग्रेस बाहर थी और पंजाब भी हार चुकी थी तो पंजाब में ऐसा कोई लीडर नहीं था जो कांग्रेस पार्टी को मजबूत कर सके तो लीडर किसको बनाया जाये ये बात चल रही थी तब कहते है की ज्ञानिज्याल सिंह जो बाद में हमारे देश के राष्ट्रपति बने उन्होंने संजय गाँधी(इंद्रा गाँधी के बेटा) को बताया की पंजाब में एक जनरैल सिंह भिंडरा वाले तेज तरार वो पंजाब में काम आ सकते है। जनरैल सिंह भिंडरा वाले जो ये सीखो के ग्रन्थ और जो सिख धर्म का विषय है उसके बारे में पूरी अध्यन कर रखे थे. सात साल के उम्र से ही ये दमदमी टक्साल में पढाई लिखाई कर रहे थे जो दमदमी टक्साल है ये चौक मेहता एक शहर है जो अमृतसर से 25 -30 KM दूर है जो एक तरह से सिख धर्म का शैक्षीक संघटन हैं। जनरैल सिंह भिंडरा वाले वही पे 7 साल के उम्र से थे.

दमदमी टक्साल के जो गुरु थे जो अपनी परम्परा तो तोड़ते हुए अपने बेटे को छोर कर जैनरैल सिंह भिंडरा वाले के काबिलियत को देखते हुए उनको दमदमी टक्साल का अध्यक्ष बना दिए अध्यक्ष बनने के बाद जनरैन सिंह का दबदबा बढ़ना शुरू हुआ इस बिच में निरंकारी और सिख के बिच में काफी विवाद चल रहा था निरंकारिओ का सिख विरोध कर रहे थे और निरंकारी सिख का विरोध कर रहे थे इसमें कई झड़प भी हुई जिसमे कई लोगो की जान भी गई और जैनरैल सिंह भिंडरा वाले निरंकारिओ के सख्त खिलाफ थे वो भी उग्र तेवर के साथ तो निरंकारी के साथ ज्यादा मार पिट शुरू हुई इसकी बरी वजह जैनरैल सिंह भिंडरावाले की सोच थी जिसकी वजह से ये चीजे हुई तो खैर कांग्रेस ने फिर ज्ञानी ज्याल सिंह के कहने पे जैनरैल सिंह भिंडरावाले को अपने साथ मिलाया लोग ये भी कहते है की कांग्रेस ने पैसे से भी जैनरैल सिंह भिंडरावाले को मदद किया और उन्ही पैसे से जैनरैल सिंह भिंडरावाले ने धीरे धीरे हथियार खरीदने शुरू किये जिसमे AK 47 एंटी टैंक लांचर तक ख़रीदा.

लेकिन कांग्रेस ने अपनी जमीं मजबूत करने के लिए जैनरैल सिंह भिंडरावाले को एक मुहरा के तौर पर इस्तेमाल किया ये फैक्ट है और जैनरैल सिंह भिंडरावाले का इस्तेमाल किया. पैसे और बाकि सब चीजे मिली वो चीजे धीरे धीरे उसे बेलगाम करती गई इसके बाद 1980 में चुनाव होता है कांग्रेस सत्ता में आती है इस दौरान में एक निरंकारी सम्मलेन चल रहा था अमृतसर में वहाँ पे जैनरैल सिंह भिंडरावाले के समर्थक और निरंकारी के समर्थक भीड़ गए जिसमे जैनरैल सिंह भिंडरावाले के करीब 13 लोग मारे गए इसके बाद ज्यादा गुस्सा जैनरैल सिंह भिंडरावाले को आया और फिर जैनरैल सिंह भिंडरावाले ने उस वक़्त जो संत निरंकारी निरंकारी समुदाय के तीसरे गुरु थे गुरु बच्चन सिंह, 24 अप्रैल 1980 की साम को उनको गोली मार दी गई और बाद में उनकी मौत हो गई जो पुलिस ने मामला दर्ज किया की इस क़त्ल में जैनरैल सिंह भिंडरावाले के समर्थक थे तो काफी हंगामा भी हुआ जो निरंकारी है उनकी तरफ से जो मेन नाम आया था रणजीत सिंह बाद में रणजीत सिंह ने समर्पण भी कर दिया लेकिन फिर रणजीत सिंह की गिरफ़्तारी के बाद मामला थोड़ा और तनावपूर्ण हो गया था और विरोध प्रद्रशन हुए|

हिंदी ही हमारी मातृ भाषा मुहीम

इसी बिच पंजाब केसरी के संस्थापक लाला जगत नारायण ने एक मुहीम चलाई अपने अखबार में की जनगणना में पूछे जाने पर हिंदी ही हमारी मातृ भाषा है बताये और यही लिखे इस मुहीम की वजह से वहाँ पे हिन्दू और सिख में थोड़ी खट्टास आ गई खासकर जैनरैल सिंह भिंडरावाले इसको लेकर काफी गुस्सा हो गए 1981 में लाला जगत नारायण का क़त्ल कर दिया जाता है इस क़त्ल में भी जैनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थक का नाम आता है अब जैनरैल सिंह भिंडरावाले के गिरफ़्तारी को लेकर मांग उठती है लेकिन सरकार जैनरैल सिंह भिंडरावाले को गिरफ्तार करने से बचना चाह रही थी और मज़बूरी में फिर दबाव परता है तो जैनरैल सिंह भिंडरावाले को गिरफ्तार किया जाता है उसके बाद पंजाब में काफी हिंसा होती है बाद में सरकार को झुकना पड़ा और तब बाकयदा लोकसभा में गृहमंत्री को ये बयान देना पड़ा की लाला जगत नारायण के क़त्ल में भिंडरावाले के खिलाफ कोई सबूत नहीं है और इसी लिए उसे छोड़ दिया गया लेकिन तबतक अब भिंडरावाला इस चीज़ से नाराज था|

कांग्रेस जितना इस्तेमाल करना चाहती थी वो कर चुकी थी कांग्रेस की अब सरकार आ गई दरबार सिंह अब मुख़्यमंत्री हो गए तो अब भिंडरावाले ने कांग्रेस से भी दुरी बना ली और वो अब अकाली दल के साथ जा मिला उस वक़्त अकाली ने धर्म युक्त मोर्चा नाम से एक मुहीम सुरु किया इस मुहीम का मकसद एक ही था की आनंदपुर साहेब जो रेसूलुशन था जो प्रस्ताव था उसको लागु करवाना और उसके लिए सरकार पे दबाव डालना.

आनंदपुर साहेब रेसूलुशन

चुकी आनंदपुर साहेब रेसूलुशन को पहले भुला दिया गया था लेकिन अब पुरे पंजाब में इसकी हवा तेज होने लगी इसका कारन था भिंडरावाले और अकाली का एक होना और इसके बाद बहुत सारे विरोध प्रद्रशन हुए और सैंकड़ो लोग मारे जाते है. और हालात लगातार बिगड़ते जा रहे थे इसी बिच में 1982 में दिल्ली में एशियाई गेम्स होना था इधर धर्म युद्ध मोर्चा का आंदोलन जारी था. 30 साल के बाद हिंदुस्तान में एशियाई गेम्स हो रहा था ये बहुत बड़ा मौका था हिंदुस्तान के लिए तब इंद्रा गाँधी ने इस एशियाई गेम्स को कामयाबी के साथ पूरा करने के लिए राजीव गाँधी को जिम्मेदारी दी थी. राजीव गाँधी ने सही से जिम्मेदारी लेकर अपनी कोशिस में लगे हुए थे लेकिन इसी दौरान होता क्या है की अकाली दल ने अपनी मांग तेज करते हुए बोला की अगर उनकी मांग पूरी नहीं होगी तो वो दिल्ली में प्रद्रशन करेंगे और पूरा सीखो का जथ्था दिल्ली पहुंचेगा.

ठीक एशियाई गेम्स के दौरान अब जब ये खबर आई तो जाहिर सी बात है की लॉ एंड आर्डर और बाकि चीजों की समस्या होने लगी की अगर ऐसा हुआ तो क्या होगा. तो इसके लिए सरकार ने पुरे हरयाणा बॉर्डर को सील कर दिया बाकि बॉर्डर जंहा पंजाब से लोग आ सकते थे सब के सब सील कर दिया गया और तलाशी ली जाने लगी और साफ आर्डर था की सीखो को एशियाई गेम्स के दौरान दिल्ली में दाखिल होने से रोका जाये|

OPERATION BLUE STAR

कहते है की OPERATION BLUE STAR की जो बुनियाद पड़ी वो इसी चीज से पड़ी. हरयाणा में भी उस वक़्त कांग्रेस की सरकार थी और कहा गया की दिल्ली में एशियाई गेम्स के दौरान सीखो को दाखिल होने से रोका जाये तलाशी लिया जाये. तो हरयाणा में तलाशी के दौरान बहुत सारी बदसूलकी और जुर्म की खबर आई उस वक़्त जो सीखो के साथ हुआ था. और यहाँ तक की जो उस वक़्त आर्मी के जो अफसर थे बहुत सारे जिन्होंने 1961 की लड़ाई लड़ी पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई लड़ी वो भी जब हरयाणा के रास्ते गुजर रहे थे तो उनको भी नहीं बख्सा गया और उनसब की जांच की गई और उन्हें बेइज्जत किया गया जिससे वो बहुत आहत हुए उसमे आर्मी के बड़े बड़े सीनियर अफसर भी थे जो इस देश के लिए इतना कुछ किया था तो पहली बार उनलोगो को लगा की सिख होने की वजह से हमारे देश में ही इस तरह का सलूक किया जा रहा है इसको लेकर पुरे पंजाब में तेजी से गुस्सा पनपा उस वक़्त अकाली इस गुस्से के साथ कुछ नहीं कर पाई लेकिन इसका फायदा उठाया भिंडरावाला ने |

भिंडरावाले ने इसको लेकर उग्र तरीके से विरोध प्रद्रशन शुरू कर दिया और इसमें खास तौर पर नौजवान सिख थे. देखते ही देखते भिंडरावाला पॉपुलर होता गया ये सारी चीजे चल रही थी और दिल्ली में एशियाई गेम्स भी ठीक ठाक से निपट जाता हैं. लेकिन ये जो आनंदपुर रेसोलुशन को लेकर धर्म युद्ध मोर्चा अकाली और भिंडरावाले का था उसका भी धरना प्रदर्शन होता था तो पुलिस दबिश डालती थी. तो उसी में से एक DIG हुआ करते थे उस वक़्त अफ्तार सिंह अटवाल इन्होने कई प्रदर्शनकारिओ हो जेल में डाला था. तो प्रदर्शनकारिओ में सबसे ज्यादा नाम अफ्तार सिंह का आ रहा था ये सारी चीजे चल रही थी. अब इधर लगातार दबदबा बढ़ता जा रहा था इन चीजों को लेकर भिंडरावाले का. तभी भिंडरावाले ने अपना जो जिस जगह से दफ्तर चलाया करता था. उसने धीरे धीरे वो दफ्तर शिफ्ट की और वो गोल्डन टेम्पल के अंदर अकाल तख़्त पर उसने अपना सारी चीजे सुरु कर दिया. तो वो अपनी जगह छोड़कर अकाल तख़्त में पहुंच चूका था. और अकाल तख़्त गोल्डन टेम्पेल (स्वर्ण मंदिर) के अंदर.

अकाल तख्त वो जगह है जहा सीखो के जो फैसले होते है उनका उस जगह से एलान होता है. और कहते है की अकाल तख्त की जो गद्दी है जो दिल्ली में मुग़ल दरबार की जो पहले हुआ करती थी उससे एक फिट ऊपर बनाई गई थी. उसके पीछे सोच ये थी की गड्डिया बादशाहो के लिए होती है. लेकिन यहाँ अकाल तख़्त भगवान् और गुरु केलिए है तो इसका कद ऊपर होना चाहिए. तो अकाल तख्त बहुत ही पवित्र स्थान है सिख धर्म के लिए| धीरे धीरे खामोसी से भिंडरावाले ने अकाल तख़्त में अपनी जगह बना ली और वही उसमे अपना सबकुछ बना लिया. इधर दो बरी हाई प्रोफाइल मर्डर होगये थे एक लाला जगत नारायण और दूसरा निरंकारी गुरु. तो उनको लेके भिंडरावाले के खिलाफ कार्रवाई का भी लगातार दबाव आ रहा था. लेकिन न पंजाब सरकार और केंद्र सरकार ये दोनों उसके खिलाफ कोई एक्सन नहीं ले रहे थे. इसी बिच में पंजाब में हुआ ये की हिन्दू और सिख के बिच में एक लकीर खींचती चली गई और भिंडरावाले के ऊपर इल्जाम ये आया की जो अमृतसर, जालंधर, चंडीगढ़ यहाँ से कई बसों जो चलती थी. उसमे रात को खास तौर पर उन बसों को निशाना बनाया जाता और हिन्दू परिवारों को चुनकर चुनकर उतारा जाता और उनको गोली मरी जाती. अइसे कई घटना हुए एक बार उतार कर 13 लोगो को मारा गया एक बार 6 लोगो को मारा गया. तो इससे न सिर्फ पुरे पंजाब में खौफ बाकि देश में भी इसका असर पड़ने लगा. और यहाँ तक की रात में बस सेवा बंद कर दी गई लेकिन ये सिलसिला जारी रहा खून खराबे का कहते है की इसके पीछे मनसा ये थी भिंडरावाले की खून खराबे से डरकर पंजाब में जो हिन्दू रह रहे है वो पंजाब छोड़ कर चले जाये और बाकि जगह जो सिख रह रहे है वो वापस पंजाब में आ जाये |

इसको लेकर बड़ा हंगामा होने लगा दिल्ली तक बात पहुंची तब उस समय प्रधान मंत्री थी इंद्रा गाँधी दबाव में आकर अपनी ही कांग्रेस की सरकार को पंजाब में बर्खास्त कर दिया. और वहां पे राष्ट्रपति शासन लागु कर दिया. इसी बिच में जब अकाल तख्त में उसने अपना ठिकाना बना लिया तो एक ऐसी चीज हुई जिसमे भिंडरावाले का खौफ पुरे पंजाब में इस कदर बढ़ा दिया की अब केंद्र सरकार को भी लगा की अब बस बहुत हो गया ये जो धर्म युद्ध मोर्चा था जो अकाली और भिंडरावाले ने मिलकर बनाया था आनदपुर रेसोलुशन को पास कराने के लिए. और इस मोर्चे के तहत जितने भी विरोध प्रद्रशन हुए उसमे प्रद्रशनकारिओ को रोकने वाले अफ्तार सिंह एक दिन गोल्डन टेम्पेल जाते है मथ्या टेकने दोपहर का वक़्त था मथ्या टेककर ये वापस आ रहे थे हाथ में प्रसाद था सीढ़ी से उतर ही रहे थे तभी अचानक इनके ऊपर गोलिओ की बछौर हो जाती है. अकाल तख्त में जो भिंडरावाले के लोग बैठे हुए थे उसके लोग देख लेते है रफ़्तार सिंह पटवाल को जो DIG थे और गोल्डन टेम्पल के सीढ़ी पे गोली मर देते है ये तो हो गई एक चीज दूसरी कई घंटो तक DIG रफ़्तार के लाश पड़ा रहता है. उसकी वजह ये थी की गोली मारने के बाद भिंडरावाले के लोग ये धमकी देकर गए थे की अगर किसी ने इसकी लाश को यहाँ से ले जाने की कोशिस की तो उसको भी मर देंगे. अब पुलिस कण्ट्रोल रूम से लेके सब तक ये बात पहुंच गई की DIG का मर्डर हो गया है गोल्डन टेम्पल में और उनकी लाश पड़ी हुई है. फिर भी कई घंटो तक किसी की हिम्मत नहीं हुई पुलिस में इतना खौफ था की भिंडरावाले के सामने जाने में पंजाब पुलिस की भी हालत ख़राब हो रही थी. कहते है की इसके बाद डरते डरते पुलिस की टीम गई कई घंटो बाद और अपने DIG की लाश को उठाकर लेकर आती है. इस एक घटना के बाद मालूम चला की पंजाब में सरकार कौन चला रहा है. किसकी ताकत है किस्से लोग खूफ खा रहे है. तो जब ये बात पता चली|

इसी दौरान अब 1984 का दौर आ चूका था 1985 में चुनाव होने थे तो इंद्रा गाँधी का ये था की 1985 से पहले पंजाब के ये मसले का हल किया जाये| उधर भिंडरावाले ने भी गोल्डन टेम्पल पर अपना पूरा कब्ज़ा कर रखा था और बहुत से हथियार, गोला बारूद भी जमा कर के रख रखा था. उसको पता था की सरकार कभी न कभी उसके खिलाफ एक्सन लेगी. भिंडरावाले का शुरू से था की लड़ाई लड़ूंगा लेकिन सरेंडर नहीं करूँगा. कुल मिलाकर पंजाब के हालत काफी ख़राब हो चुके थे. केंद्र सरकार के पास कोई रास्ता नहीं था. तब ऐसे वक़्त में इंद्रा गाँधी को फैसला लेना था की क्या करे और इस फैसले से पहले गोल्डन टेम्पेल में सन्देश भेजा गया की आपलोग समर्पण कर दो आपकी मांग को पूरा किया जायेगा. लेकिन हर बातचीत के प्रस्ताव को भिंडरावाला ने ठुकरा दिया और उधर भिंडरावाले के कहने पे खून खराबा जारी था 30 मई 1984 की रात को तब अमृतसर के आसपास पहली बार फ़ौज को देखा गया और वहां पे पहले से बाकायदा CRPF और BSF थी और पंजाब पुलिस के लोग थे. इसके बाद 1 जून की रात को करीब 9 बजे से अमृतसर में कर्फ्यू  लगा दिया जाता है. बाकायदा प्रशासन के तरफ से एलान करके कर्फ्यू लगाने के बाद अगले 24 घंटो में मतलब 2 जून की रात 9 बजे तक करीब 70000 सैनिक अमृतसर और पंजाब में फ़ैल जाते है. 2 जून की रात को इंद्रा गाँधी दूरदर्शन पर आती है और बाकायदा देश के नागरिको को सन्देश देती है. उनका यही कहना था की जो केंद्र सरकार है वो पंजाब में जो आतंक और हिंसा है इसका अंत करेगी और उन्होंने पंजाब के तमाम नेता से अपील की की वो आने वाले दिनों में विरोध प्रद्रशन न करे. ये उन्होंने दूरदर्शन पे एलान किया इस एलान के बाद 3 जून की तारीख आती है अमृतसर में फ़ोन के तार सुबह से ही काट दिए जाते है तब मोबाइल था नहीं जितने भी मीडिया के लोग है और विदेशी है उनको वहां से बाहर कर दिया जाता है ट्रैन, बस इन सबके रुट पे रोक लगा दी जाती है. पंजाब के आसपास पाकिस्तान का जो बॉर्डर लगता है उसको सील कर दिया जाता है और पूरी फ़ौज गोल्डन टेम्पल को अपनी घेरे में ले लेती है. भिंडरावाले के साथ उस वक़्त अकाल तख्त में अमरिख सिंह भी थे और दूसरा आदमी था साहबेक सिंह थे.

अब सेना वहां पहुंच चुकी थी और पुरे अमृतसर को अपने कब्जे में ले लिया था. और गोल्डन टेम्पल को घेरे में लेने के बाद वो कोई ऑपरेशन नहीं कर रहे थे. क्यूंकि उनको हरी झंडी नहीं मिली थी कोशिस ये थी की ये लोग आ जाये और सेना एलान करती है की जो लोग भी गोल्डन टेम्पल के अंदर है वो बाहर आ जाये और अपने आप को सरेंडर कर दे. इसके बाद आर्मी खामोसी से इंतजार करते रहती है कुछ टुकड़ी में लोग आये जो लोग मथ्या टेकने गए थे. उस समय गोल्डन टेम्पल में जो सेना थी उनके मेजर थे कुलदीप सिंह और सेना के नवी बटालियन के जो खास तमाम लोग थे वो गोल्डन टेम्पल के चारो तरफ फैले हुए थे. उसके बाद 4 जून को भी आर्मी एलान करती है की आपलोग बाहर आ जाये फिर कुछ लोग आते है दूसरा दिन निकल जाता है. आर्मी की पूरी घेराबंदी है 5 जून तक करीब मुश्किल से सिर्फ 150 लोग गोल्डन टेम्पल से बाहर निकलते है. तब मज़बूरी में एक कोड नाम दिया गया था. और उस कोड नाम पे अम्ल करने का वक़्त आ गया था.

5 जून 1984 को ठीक शाम को 7 बजे उस कोड नाम का अम्ल करने का वक़्त आता है और वो जो कोड था OPERATION BLUE STAR इसके कोई और मतलब नहीं थे ये बस ऑपरेशन का कोड नाम रखा गया था. ठीक 7 बजे मेजर कुलदीप सिंह को ये इशारा मिलता है और गोली बारी शुरू होती है. जैसे ही बाहर से गोली चलती है तो अंदर से भी बहुत सारे जवाब आते है भिंडरावाले को एक चीज पता था की आर्मी आई है डराएगी धमकाएगी लेकिन गोल्डन टेम्पल पर हमला नहीं कर सकती. क्युकी ये सीखो का ये सबसे बड़ा धर्म स्थल है और आर्मी के सामने दिक्कत भी यही आरही थी क्यूंकि स्वर्ण मंदिर को नुकसान हो सकता था. लेकिन जो आर्मी को इनपुट मिला था इंटेलिजेन्स से वो गलत मिला था. आर्मी वाले चाहते थे की उनके पास जो गोली बारूद है जल्द से जल्द ख़त्म करा दिया जाये लेकिन यहाँ उल्टा हो रहा था बाहर से 10 फायर हो रहा है तो अंदर से 50 फायर हो रहे थे इससे ये पता चल रहा था की जो जानकारी थी ख़ुफ़िया वालो की वो गलत थी. और इससे बहुत बड़ा नुकसान हुआ इस OPERATION BLUE STAR में भी तो अब ये था की अंदर जाकर हमला करना है.

आर्मी वालो ने कुछ पंजाब पुलिस को भी अपने पास रखा था क्युकी पंजाब पुलिस गोल्डन टेम्पल के चपे चपे से वाखिब थे. एक जो गलती होती है वो ये होती है की जब अंदर आर्मी के जवान जाते है. अकाल तख्त की तरफ क्यूंकि अकाल तख्त टारगेट था. क्यूंकि सबको पता था की भिंडरावाला वही पे है लेकिन वह जो जानकारी थी वह गलत थी. और पहली खेप में ही लगभग 15 -20 जवानो की मौत हो जाती है क्युकी वो लोग अलग अलग पोजीशन ले रखी थी. और हमारी इनफार्मेशन गलत थी तो इसके बाद जब ये तबाही होती है तो ये बड़ा धक्का था आर्मी के लिए 10 घंटे बाद आर्मी को लगता है की इस तरह से तो कुछ नहीं हो सकता तो 6 जून को सुबह 5 बजके 20 मिनट पर आर्मी टैंक वंहा पर बुलाने की गुजारिश करती है. अब ये बड़ा मुश्किल फैसला था लेकिन फिर भी टैंक आता है टैंक के जरिये फिर अंदर हमला किया जाता है. और हमला करने के बाद फिर सुबह से दिन भर छिटपुट छिटपुट गोलीबारी होती है फिर आर्मी अँधेरा होने का इंतजार करने लगती है फिर अँधेरा होता है.

इसके बाद टैंक के जरिये बाकायदा हमला शुरू होता है लेकिन जो लोकेशन था उसके हिसाब से चारो तरफ ऊपर से भी गोलिया चल रही थी तो फिर जवानो का बहुत बड़ा नुकसान होता है. लेकिन ये था की एक चीज तय थी की जबतक आप अकाल तख्त में नहीं घुसेंगे तबतक ये ऑपरेशन कामयाब नहीं होगी. तो अबतक जितनी टीम ने अकाल तख्त में घुसने की कोसिस की सारी की सारी टीम नाकामयाब रही. एक टीम थी जो किसी तरह अकाल तख्त तक पहुंचने में कामयाब हो गई 6 जून को और धमाका भी होता है. और पूरा OPERATION रात भर चलता है. 7 जून की सुबह फिर ये ऑपरेशन को ख़त्म माना जाता है. लेकिन उससे पहले इस ऑपरेशन में अकाल तख्त को बहुत जबरदस्त नुकसान पहुंच चूका था धमाके के वजह से. सेना वालो का कहना था की ज्यादातर धमाके भिंडरावाले के लोग किये थे. लेकिन ये भी कहा जाता है की धमाके किसी भी तरफ से हो सकते है तो खैर जब अकाल तख्त में टीम पहुँचती है तो उसमे बहुत सारी लाशे पड़ी हुई थी. और देर रात उस लाशो में से एक लाश मिलती है जिसको पहचाना जाता है वो भिंडरावाले की लाश थी.

जब भिंडरावाले की लाश मिली तो लगा की ऑपरेशन ख़त्म हो गया लेकिन इसके बाद भी छिटपुट गोलिया चल रही थी फिर उन बाकि बचे लोगो को पकड़ा गया. और 7 जून को एलान किया जाता है की ऑपरेशन ख़त्म किया जाता है. इधर जो राष्ट्रपति थे ज्ञानिज्याल सिंह उनको इन सब के बारे में इंद्रा गाँधी ने कुछ नहीं बताया था. इससे वे नाराज़ भी थे 8 जून को ज्ञानिज्याल सिंह को हरमिंदर साहिब (GOLDEN TAMPLE) भेजा जाता है. इत्तेफाक से उस वक़्त भी वहाँ संदिग्ध लोग थे और ज्ञानिज्याल सिंह के ऊपर एक गोली चलती है. इत्तेफाक से वो गोली इन्हे नहीं लगती है और वो गोली उनकेसाथ चल रहे एक अफसर को लगती है.

हजारों लोगो की मौत OPERATION BLUE STAR में 

फिर इसके बाद पुलिस तलाशी लेती है और सभी लाशो को हटाती है इस पुरे OPERATION BLUE STAR में 83 सेना के जवान शहीद हुए 248 के करीब घायल हुए और 492 आम आदमी और आतंकी मारे गए और बहुत बरी तादाद थी घायलों की लेकिन ये भी कहा जाता है की इसमें 1000 से ज्यादा लोगो की जान गई थी 250 से ज्यादा सेना के लोगो की जान गई थी पहली बार इस गोल्डन टेम्पल में तीन दिन तक पूजा नहीं होती है ये इतिहास में पहली बार ऐसा होता है इस BLUE STAR OPERATION के बाद पुरे सिख समुदाय में भरपूर गुस्सा देखने को मिला कुछ सेना के लोग भी बागी हुए थे ये बड़ा अजीब समय था खैर किसी तरह कण्ट्रोल हुआ फिर इसके चार महीने बाद 31 अक्टूबर 1984 को इंद्रा गाँधी के उनके ही सिख बॉडीगार्ड बेअंत सिंह और सतवंत सिंह के द्वारा गोलिओ से मार दिया जाता है और फिर इसके बाद शुरू होती है 1984 की दंगा और इस दंगे में भी हजारों लोगो की मौत हो जाती है ये सब चीजों का तार कहीं न कहीं OPERATION BLUE STAR से जुड़ी हुई थी।

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