एक लड़के की उलझन

0
Shadishuda larke ki paresani

एक लड़के की उलझन
बेटा – मां मैं और तुम्हारी बहु बाहर जा रहे हैं। आज हमारी शादी की सालगिरह है।
मां – हां – हां ज़रूर जाओ। जैसे बस यही एक काम बचा है। और तो कुछ हैं ही नहीं।
बेटा – मां तुम भी न बस चालु हो जाती हो।
मां (बेटे की बात काटते हुए) – हां बेटा अब बीवी जो आगइ है । मेरी बात करवी तो लगेगी ही।
बेटा – मां ऐसी बात नहीं है।
मां – हां बेटा सब समझ आता है।बच्ची नहीं रही अब।
बेटा – ठीक है नहीं जाता। अब खुश हो।
मां – हां- हां ताकि तेरी बीवी कह सके ।मेरी‌‌ सासु‌ मां ब‌हु‌‍त बुरी है।
बेटा – ऐसा कुछ नहीं है। वो ऐसी नहीं है।
मां – हां बुरी तो मैं हूं। तो तुम्हें रोकते – टोकते रहती हूं।
बेटा ( अपनी बीवी को पुकारते‌ हुए ) –  अच्छा सुनो घर में ही कुछ बना लो मां की तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है। उन्हें अकेले छोड़ कर कहीं जाना अच्छा नहीं  है।
बहु – ठीक है।
कुछ दिन बाद बेटी घर आई
मां – बेटी कैसी हो। घर में सब ठीक है न।
बेटी – हां मां सब ठीक है। तुम ठीक हो ना।
मां – हां ठीक ही हूं। अच्छा ये बता अगले महीने तेरी शादी की सालगिरह है न। क्या सोचा है।
बेटी – वो हमलोग सिमला जा रहे हैं।
मां – अच्छे से घुम लेना।साल भर तो ससुराल वालों की सेवा करने में ही बीजी रहती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

2 × 1 =